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शाश्वत भारतीय संस्कृति एवं निःस्वार्थ सेवा

संस्थान की आधारशिला एवं मूल दर्शन

10 अप्रैल 1967 को रोपा गया एक पावन बीज, जो आज भारत एवं विश्व भर में लाखों साधकों को शारीरिक आरोग्यता, मानसिक शांति और आध्यात्मिक आनंद प्रदान करने वाला विशाल वटवृक्ष बन चुका है।

10 अप्रैल 1967
पावन स्थापना वर्ष
59+ वर्ष की अविरल सेवा यात्रा
4,500+
निःशुल्क योग केंद्र
सार्वजनिक उद्यानों व पार्कों में
23+ राज्य • 10+ देश
सक्रिय क्षेत्रीय विस्तार
लाखों समर्पित साधक व परिवार
100% निःशुल्क
निष्काम सेवा भाव
न शुल्क, न चंदा, पूर्णतः अवैतनिक

ऋषि परंपरा का पुनर्जागरण: आश्रमों से जन-साधारण के द्वार तक

10 अप्रैल 1967 को राजधानी दिल्ली की पावन भूमि (दिल्ली विश्वविद्यालय के निकट पहाड़ी पर स्थित बाउन्टे वाले पार्क) में भारतीय योग संस्थान (पंजीकृत) की आधारशिला रखी गई थी। यह एक गैर-साम्प्रदायिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पूर्णतः निःस्वार्थ सेवाभावी आध्यात्मिक संस्था है।

संस्थान के प्रेरणा-स्रोत एवं संस्थापक श्रद्धेय श्री प्रकाश लाल जी को प्रथम योग केंद्र आरम्भ करने की पावन प्रेरणा बिहार योग विद्यालय (मुंगेर) के स्वामी सत्यानंद जी सरस्वती तथा माँ योग शक्ति जी के दिल्ली आगमन के दौरान मिली। जब बातचीत में यह तथ्य सामने आया कि विदेशी शिष्य भारत आकर भारतीयों को योग सिखा रहे हैं, तब श्रद्धेय प्रकाश लाल जी के मन में यह स्वाभिमान व उदात्त संकल्प जागा: "जब विदेशी लोग आकर भारत की पावन योग विद्या सिखा सकते हैं, तो हम भारतवासी अपनी ही ऋषि-धरोहर को जन-जन तक निःशुल्क क्यों नहीं पहुंचा सकते?"

इस दिव्य संकल्प को साकार करने हेतु श्रद्धेय प्रकाश लाल जी ने श्री जवाहर लाल जी (जो इस प्रथम केंद्र के प्रथम केंद्र प्रमुख बने) एवं श्री रामेश्वर दास अग्रवाल जी के सहयोग से प्रथम उपवन योग केंद्र आरंभ किया। जो योग केवल प्राचीन आश्रमों, गुफाओं और कंदराओं तक सीमित था, उसे प्रातःकाल की अमृतवेला में खुले उद्यानों के माध्यम से हर आम नागरिक के लिए सुलभ बना दिया गया।

"जीओ और जीवन दो" (Live & Let Live)
"वसुधैव कुटुम्बकम्" (विश्व एक परिवार)
"सर्वे भवन्तु सुखिनः" (समग्र कल्याण)
"अप्प दीपो भव" (स्वयं प्रेरणा दीप बनो)

"योग किसी विशेष संप्रदाय, जाति, वर्ग या अमीर-गरीब की जागीर नहीं है; यह तो समस्त मानव जाति के शारीरिक, मानसिक व आत्मिक कल्याण हेतु हमारे पूर्वज ऋषियों का अनमोल उपहार है।"

भारतीय योग संस्थान साधना केंद्र
1967 से निरंतर सेवारत • भारतीय योग संस्थान
निःशुल्क प्रातःकालीन साधना: संस्थान के 4,500 से अधिक केंद्रों पर प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय के समय 1 घंटे का नियमित निःशुल्क योग अभ्यास कराया जाता है।

संस्थान के मूल सांस्कृतिक आदर्श

भारतीय योग संस्थान केवल शारीरिक व्यायाम नहीं सिखाता, अपितु भारतीय संस्कृति के उदात्त मानवीय मूल्यों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है।

वसुधैव कुटुम्बकम्

"उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्"

संपूर्ण धरा ही हमारा एक विशाल परिवार है। जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा अथवा आर्थिक भेदभाव की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर संस्थान सभी मानवों में एकात्मता का भाव जागृत करता है। हमारे केंद्रों पर सभी साधक एक समान श्रद्धा और आत्मीयता से साधना करते हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिनः

"सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु"

सब सुखी हों, सब पूर्णतः निरोगी हों, सबका कल्याण हो और किसी को भी दुःख का सामना न करना पड़े। संस्थान का प्रत्येक सदस्य इस वैदिक मंगल-कामना को केवल प्रार्थना तक सीमित न रखकर, समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा पहुँचाने हेतु निरंतर क्रियाशील रहता है।

निष्काम मानव सेवा

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"

संस्थान का संपूर्ण तंत्र निःस्वार्थ सेवा भाव पर आधारित है। संस्थान का कोई भी योग शिक्षक, ज़ोन अधिकारी अथवा राष्ट्रीय स्तर का पदाधिकारी किसी भी प्रकार का वेतन या मानदेय स्वीकार नहीं करता। समाज को स्वस्थ और सुखी बनाना ही हमारा एकमात्र पारितोषिक है।

उद्देश्य एवं संकल्प

हमारा ध्येय (Vision) एवं पावन लक्ष्य (Mission)

मानव कल्याण की दिशा में अग्रसर भारतीय योग संस्थान का स्पष्ट दृष्टिकोण एवं व्यावहारिक कार्ययोजना

हमारा ध्येय (Our Vision)

विश्व के प्रत्येक घर, परिवार एवं हृदय में योग की पावन ज्योति जलाना, जिससे प्रत्येक मनुष्य शारीरिक रूप से पुष्ट व निरोगी, मानसिक रूप से शांत व एकाग्र तथा आत्मिक रूप से आनंदित रह सके।

हम एक ऐसे स्वस्थ व सशक्त समाज की परिकल्पना करते हैं जो तनाव, अनिद्रा, मधुमेह, हृदय रोग तथा आधुनिक जीवनशैली जन्य व्याधियों से पूर्णतः मुक्त हो और प्रकृति के नियमों के अनुकूल सात्विक व संयमित जीवन व्यतीत करे।

हमारा पावन लक्ष्य (Our Mission)

देश एवं विदेशों के प्रत्येक नगर, उपनगर और ग्रामीण अंचल के सार्वजनिक उद्यानों, सामुदायिक भवनों एवं विद्यालयों में निःशुल्क दैनिक योग साधना केंद्रों की स्थापना करना।

चरित्रवान, सेवाभावी एवं सुशिक्षित स्वयंसेवी योग शिक्षकों की एक विशाल राष्ट्रव्यापी श्रृंखला तैयार करना तथा शास्त्रीय अष्टांग योग, षट्कर्म (नेति, धौति, कुंजल), प्राणायाम, मुद्रा विज्ञान एवं प्राकृतिक आहार पद्धति को जन-सामान्य के लिए सरल, वैज्ञानिक व सुलभ बनाना।

संस्थान के चार प्रमुख आधारस्तम्भ

भारतीय योग संस्थान की संपूर्ण शिक्षण एवं सेवा प्रणाली इन चार आधारभूत स्तम्भों पर सुदृढ़ता से टिकी हुई है:

१
निष्काम सेवा
Selfless Service

संस्थान में कोई भी शिक्षक वेतनभोगी नहीं है। सभी शिक्षक साधक के रूप में आते हैं और निःस्वार्थ भाव से समाज को योग का उपहार प्रदान करते हैं। सेवा ही हमारी सर्वोच्च साधना है।

२
काया शोधन व षट्कर्म
Internal Purification

जल नेति, सूत्र नेति, कुंजल, कपालभाति एवं शंखप्रक्षालन द्वारा शरीर के आंतरिक अंगों का प्राकृतिक शोधन, जिससे विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं और त्रिदोष संतुलित होते हैं।

३
चित्त शुद्धि व ध्यान
Mental Stability

प्राणायाम, प्रत्याहार, ओंकार जप एवं ध्यान के माध्यम से मानसिक एकाग्रता, आंतरिक शांति और तनाव मुक्ति। चित्त की चंचल वृत्तियों का निरोध कर आत्मिक आनंद की अनुभूति।

४
सात्विक व मिताहार
Sattvic Living

"जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन"। मौसमी फल, सब्जियां, अंकुरित अन्न, प्राकृतिक क्षारीय रस तथा सुपाच्य संतुलित आहार द्वारा शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता का संवर्धन।

भारतीय योग संस्थान की विशिष्ट कार्यपद्धति

जानिए क्या बनाता है भारतीय योग संस्थान को विश्व का सबसे अनूठा और प्रभावी निःस्वार्थ योग संगठन:

प्रातःकालीन उपवन साधना (Morning Open Assemblies)

वातानुकूलित कमरों के बजाय खुले पार्कों और प्राकृतिक उद्यानों में प्रातःकालीन ताजी प्राणवायु (Oxygen) तथा सूर्य की अमृतमयी किरणों के सानिध्य में योग अभ्यास।

वैज्ञानिक व सुव्यवस्थित दैनिक क्रम (Standardized Daily Routine)

सूक्ष्म क्रियाएं, खड़े होकर, बैठकर, पेट के बल व पीठ के बल किए जाने वाले आसन, षट्कर्म, प्राणायाम, ध्यान, हास्य योग और अंत में वैदिक शांति पाठ का सुव्यवस्थित क्रम।

रोगानुसार व्यक्तिगत मार्गदर्शन (Therapeutic Guidance)

अनुभवी योग शिक्षकों द्वारा साधकों की व्यक्तिगत व्याधियों (मधुमेह, उच्च रक्तचाप, सर्वाइकल, साइटिका, मोटापा) के अनुरूप विशेष यौगिक आसनों व आहार का परामर्श।

प्रामाणिक साहित्य एवं मासिक पत्रिका 'योग मंजरी' (Literature)

योग साधना, आहार विज्ञान, रोग निवारण व अध्यात्म पर संस्थान द्वारा प्रकाशित उच्चस्तरीय प्रामाणिक पुस्तकें तथा नियमित मासिक पत्रिका का देशव्यापी प्रसार।

श्रद्धेय श्री प्रकाश लाल जी

श्रद्धेय श्री प्रकाश लाल जी

संस्थापक, भारतीय योग संस्थान

(1 मार्च 1921 — 30 जुलाई 2010)

"दूसरों में प्राण फूंक दे अर्थात प्रेरणा का स्रोत बन जाए"

"आज हमारा समाज निष्प्राण दीखता है। कुछ करना नहीं दूसरा करे, हमें करना न पड़े ऐसी स्थिति दीखती है। संस्थान ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण करना चाहता है जो लेटे को बैठा दे, बैठे को खड़ा कर दे और खड़े को दौड़ा दे। दूसरों में प्राण फूंक दे अर्थात दूसरे का प्रेरणा-स्रोत बन जाये।"

अंतिम पावन संदेश — 10 जुलाई 2010 संस्थापक का संपूर्ण जीवन परिचय पढ़ें →

आइए, योग के इस पावन महायज्ञ से जुड़ें!

आज ही अपने निकटतम भारतीय योग संस्थान के प्रातःकालीन साधना केंद्र से जुड़ें और स्वयं को एवं अपने परिवार को पूर्णतः स्वस्थ, तनावमुक्त और आनंदित बनाएं।