परिचय संस्थापक
श्रद्धेय श्री प्रकाश लाल जी
भारतीय योग संस्थान के संस्थापक श्रद्धेय श्री प्रकाश लाल जी का जन्म सरगोधा (पाकिस्तान) में 1 मार्च 1921 को हुआ। वे ऐसे युग पुरुष थे जिन्होंने निःशुल्क योग केन्द्रों के माध्यम से लाखों व्यक्तियों को स्वस्थ जीवन जीने का मार्ग दिखाया तथा निष्काम कर्म करने की ओर प्रेरित किया।
“सर्वे भवन्तु सुखिनः” एवं “वसुधैव कुटुम्बकम्” को अपना आदर्श बनाकर तथा “जीओ और जीवन दो” के सिद्धान्त के अनुरूप उन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में लगा दिया। योग जो केवल आश्रमों तक सीमित था उसे घर-घर पहुंचाने का उन्होंने भगीरथ प्रयास किया जिसकी गंगा आज भी अनवरत बह रही है। वे अष्टांग योग साधक, कर्मठता, सरलता, निश्चलता, निष्कपटता, विनम्रता, अडिगता, निर्भीकता, अनथकता तथा जीवंतता की साकार प्रतिमूर्ति थे।
श्रद्धेय प्रकाश लाल जी को प्रथम योग केन्द्र आरम्भ करने की प्रेरणा बिहार योग विद्यालय, (मुंगेर, बिहार) के स्वामी सत्यानन्द जी सरस्वती तथा शिवानन्द पब्लिक स्कूल गोंदिया (महाराष्ट्र) की श्रद्धेया माँ योग शक्ति से मिली। स्वामी जी व माता जी कुछ विदेशी शिष्यों सहित दिल्ली आए। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि अब विदेशी भारतीयों को योग सिखाएंगे। यह बात सुन कर श्री प्रकाश लाल जी के मन में यह भाव आया कि भारत की योग विद्या को विदेशी लोग आकर सिखाएंगे, भारतीय क्यों नहीं? इस घटना से प्रेरित हो 10 अप्रैल 1967 को श्रद्धेय श्री प्रकाश लाल जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पास पहाड़ी पर बाउन्टे वाले पार्क में प्रथम योग केन्द्र की स्थापना की।
यह कार्य उन्होंने सर्वश्री जवाहर लाल जी तथा रामेश्वर दास अग्रवाल जी के सहयोग से आरम्भ किया। इस केन्द्र के प्रथम केन्द्र प्रमुख बनने का सौभाग्य श्री जवाहर लाल जी को प्राप्त हुआ। यह केन्द्र धीरे-धीरे एक वट वृक्ष के रूप में फैल गया। आज देश-विदेश में संस्थान के 4500 से अधिक निःशुल्क योग साधना केन्द्र हैं।
श्री प्रकाश लाल जी ऐसे व्यक्ति थे जो बोलते बहुत कम थे पर अपने आचरण के माध्यम से सारी बात कह देते थे। उन्होंने योग मंजरी व योग साहित्य के प्रकाशन द्वारा योग का प्रचार एवं प्रसार किया। वे साधकों के सुख-दुख में शामिल होते, उनसे पारिवारिक संबंध रखते, सभी कार्यों को ईश्वरीय कार्य समझ कर करते, रात को सोने से पहले आत्म-चिंतन करते, दूसरों की आलोचना किए बिना अपने विचार रखते, जब राह सुझाई नहीं देती तो अपने भीतर बैठे परमात्मा से बात कर मार्ग-दर्शन लेते। उन्होंने अपने देदीप्यमान व्यक्तित्व को जीवन पर्यंत एक दीप की भांति प्रज्वलित रखा और “अप्प दीपो भव” की उक्ति को चरितार्थ किया। स्वयं प्रेरणा दीप बन कर भारतीय योग संस्थान के कार्यकर्त्ताओं के रूप में हजारों लाखों दीप जगमगा दिये ताकि इस धरा पर प्रत्येक मानव का कल्याण हो सके।
श्रद्धेय प्रकाश लाल जी ने समय-समय पर आवश्यकतानुसार संस्थान के प्रधान तथा महामंत्री के पदों को भी विभूषित किया। 30 जुलाई, 2010 को 89 वर्ष की आयु में, श्रद्धेय प्रकाश लाल जी अपना पार्थिव शरीर छोड़ ब्रह्मलीन हो गए। यह दिन अब स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।
उनका अंतिम संदेश (10 जुलाई, 2010): "आज हमारा समाज निष्प्राण दीखता है। कुछ करना नहीं दूसरा करे, हमें करना न पड़े ऐसी स्थिति दीखती है। संस्थान ऐसे कार्यकर्त्ताओं का निर्माण करना चाहता है जो लेटे को बैठा दे बैठे को खड़ा कर दे और खड़े को दौड़ा दे। दूसरों में प्राण फूंक दे अर्थात दूसरे का प्रेरणा-स्रोत बन जाये।"
श्रद्धेय श्री प्रकाश लाल जी
संस्थापक, भारतीय योग संस्थान
(1 मार्च 1921 — 30 जुलाई 2010)