Lorem ipsum is simply free text dolor sit am adipi we help you ensure everyone is in the right jobs sicing elit, sed do consulting firms Et leggings across the nation tempor.

Latest News

Contact Info
आहार शुद्धि एवं पोषण विज्ञान

संतुलित यौगिक आहार (Balanced Yogic Diet)

"जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन" — भारतीय योग संस्थान द्वारा निर्देशित सात्विक, प्राकृतिक एवं संतुलित आहार पद्धति, जो शरीर को पूर्ण निरोगी, स्फूर्तिवान और चित्त को शांत रखती है।

सात्विक आहार

ताज़ा, सुपाच्य, पोषक एवं शाकाहारी भोजन

मिताहार का नियम

आधा पेट भोजन, चौथाई जल, चौथाई रिक्त

रोग निवारण

बीपी, मधुमेह व मोटापा से प्राकृतिक मुक्ति

प्राकृतिक डिटॉक्स

उषापान, अंकुरित अन्न व मौसमी फल-रस

आहार ही औषधि है: योग में भोजन का महत्व

महर्षि पतंजलि एवं हठयोग प्रदीपिका के अनुसार, योग साधना की सफलता में आहार की भूमिका 50% से भी अधिक मानी गई है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है — "युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु" अर्थात् जिसका आहार-विहार संतुलित और नियमित है, उसी के समस्त कष्ट और रोग योग द्वारा नष्ट होते हैं।

भारतीय योग संस्थान साधकों को कृत्रिम सप्लीमेंट्स या भूखे रहने की कठोर डाइटिंग के बजाय, प्राकृतिक, सात्विक एवं संतुलित मौसमी आहार अपनाने की प्रेरणा देता है। सही समय, सही मात्रा और शांत मन से किया गया भोजन अमृत के समान कार्य करता है।

“अन्न केवल भूख मिटाने का साधन नहीं, अपितु यह हमारे विचारों, भावनाओं और रक्त की प्रत्येक बूंद का निर्माण करता है। अतः आहार सदा शुद्ध, सात्विक एवं पवित्र भाव से ग्रहण करें।”

हठयोग प्रदीपिका सिद्धांत

मिताहार (Mitahara) का वैज्ञानिक विभाजन

मिताहार का अर्थ है पेट के चार भागों की संतुलित व्यवस्था:

१/२
आधा भाग — सात्विक ठोस भोजन
रोटी, दाल, मौसमी सब्ज़ियां, अंकुरित अन्न व सलाद
१/४
एक-चौथाई भाग — जल अथवा तरल
ताज़ी छाछ, सूप या भोजन के 45 मिनट बाद पर्याप्त जल
१/४
एक-चौथाई भाग — वायु हेतु रिक्त
जठराग्नि के सुचारु प्रदीप्त होने व सुगम पाचन हेतु खाली स्थान

भोजन के तीन प्रकार: सात्विक, राजसिक एवं तामसिक

भगवद्गीता के १७वें अध्याय के अनुसार भोजन के गुण सीधे हमारी मनःस्थिति और स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

सात्विक आहार

(सर्वोत्तम एवं स्वास्थ्यवर्धक)

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाने वाला आहार।

  • ताज़ा मौसमी फल व हरी सब्ज़ियां
  • अंकुरित अन्न (मूंग, चना, मेथी)
  • बिना छना आटा, दलिया, खिचड़ी
  • दूध, मक्खन, घी, शहद व सूखे मेवे
  • ताज़ी छाछ एवं नारियल पानी
मन शांत, एकाग्र एवं देह रोगमुक्त रहती है।

राजसिक आहार

(उत्तेजक एवं अशांतिकारक)

अति कड़वे, खट्टे, नमकीन, तीखे, गरम और जलन पैदा करने वाले पदार्थ।

  • अत्यधिक लाल मिर्च, गरम मसाले व खटाई
  • तले-भुने पकौड़े, समोसे व चाट
  • चाय, कॉफ़ी व एनर्जी ड्रिंक्स की लत
  • अत्यधिक नमक व सिरके वाले अचार
  • तनाव में शीघ्रता से किया गया भोजन
रक्तचाप, एसिडिटी, गुस्सा व चंचलता बढ़ाता है।

तामसिक आहार

(रोगकारक एवं सर्वथा वर्जित)

बासी, दुर्गंधयुक्त, कृत्रिम, रासायनिक व प्राणविहीन सड़ा-गला भोजन।

  • फ्रिज में रखा कई दिन पुराना बासी खाना
  • फास्ट फूड, पिज्जा, बर्गर व मैदे की चीजें
  • डिब्बाबंद (Processed & Canned) खाद्य
  • मांसाहार, मद्यपान व धूम्रपान
  • अत्यधिक मीठे कार्बोनेटेड शीतल पेय
सुस्ती, मोटापा, कब्ज, आलस्य व असाध्य रोगों का जनक।

प्रातः से रात्रि तक आदर्श यौगिक दिनचर्या व आहार

कब खाएं, क्या खाएं और कैसे खाएं — प्राकृतिक घड़ी (जैविक लय) के अनुकूल दैनिक समय-सारणी।

प्रथम चरण
प्रातः 5:00 - 6:00 बजे

उषापान (प्राकृतिक शुद्धि)

बिस्तर छोड़ते ही बिना कुल्ला किए 1 से 2 गिलास गुनगुना जल (संभव हो तो तांबे के बर्तन में रखा जल) उकड़ू बैठकर घूंट-घूंट पिएं।

लाभ: आंतों की पूर्ण सफाई, कब्ज निवारण व ताजगी।
द्वितीय चरण
प्रातः 8:00 - 9:00 बजे

साधना उपरांत प्राण पोषक नाश्ता

दैनिक योग साधना के 30-45 मिनट बाद: अंकुरित मूंग/चना, ऋतु फल (पपीता, सेब, अमरूद, संतरा), 4-5 भीगे बादाम व मुनक्का।

लाभ: पूरे दिन हेतु भरपूर ऊर्जा, फाइबर व विटामिन।
तृतीय चरण
दोपहर 12:30 - 1:30 बजे

दोपहर का मुख्य संतुलित भोजन

बिना छने चोकरयुक्त आटे की 2-3 रोटियां, हरी पत्तेदार मौसमी सब्ज़ी, एक कटोरी दाल, ताज़ा कच्चा सलाद (भोजन से पहले) और एक कटोरी ताज़ी छाछ।

नियम: भोजन को खूब चबा-चबाकर 25-30 मिनट में करें।
चतुर्थ चरण
सायं 4:30 - 5:30 बजे

सायंकालीन अल्पाहार

चाय या कॉफ़ी के स्थान पर हर्बल काढ़ा, नींबू पानी, नारियल पानी अथवा ताज़ा सब्ज़ियों का सूप या भुने हुए मखाने व चने।

लाभ: शरीर की ऊर्जा पुनः सक्रिय, एसिडिटी से बचाव।
पंचम चरण
रात्रि 7:00 - 8:00 बजे (सूर्यास्त के आसपास)

रात्रि का सुपाच्य लघु आहार

सोने से कम से कम 2-3 घंटे पूर्व। अत्यंत हल्का आहार: मूंग दाल की पतली खिचड़ी, दलिया या उबली हुई सब्ज़ियां। रात्रि में दही, चावल व गरिष्ठ भोजन से बचें।

नियम: भोजन उपरांत 5-10 मिनट वज्रासन अवश्य लगाएं।
शयन पूर्व
रात्रि 9:30 - 10:00 बजे

सुखद निद्रा की तैयारी

यदि आवश्यकता हो तो एक कप गुनगुना हल्दी युक्त गाय का दूध। सोने से पूर्व हल्का टहलें, दिन भर का मानसिक तनाव त्यागें और शांत भाव से शयन करें।

लाभ: गहरी, शांतिपूर्ण निद्रा एवं मांसपेशियों की मरम्मत।

आहार ग्रहण के ८ स्वर्णिम नियम

भोजन करने का ढंग उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि भोजन की गुणवत्ता। इन नियमों का पालन करने से पाचन तंत्र सुदृढ़ रहता है:

१
प्रसन्नचित्त एवं शांत मन से भोजन करें
क्रोध, जल्दबाजी, चिंता या मोबाइल देखते हुए भोजन न करें। भोजन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें।
२
भोजन को खूब चबाकर खाएं ("भोजन को पियो")
प्रत्येक ग्रास को कम से कम ३२ बार चबाएं ताकि लार (Saliva) मिलकर भोजन को सुपाच्य बना सके।
३
भोजन के तुरंत बाद पानी न पिएं
भोजन के तुरंत बाद पानी पीने से जठराग्नि मंद हो जाती है। पानी भोजन के ४५ मिनट बाद ही पिएं।
४
प्राकृतिक एवं मौसमी आहार अपनाएं
बेमौसम की बासी सब्ज़ियों के बजाय स्थानीय व ऋतु के अनुकूल ताज़े फल व सब्ज़ियों को प्राथमिकता दें।
५
अतिशीतित (Chilled) पानी व बर्फ से बचें
फ्रिज का ठंडा पानी पाचन तंत्र, गले व जोड़ों को क्षति पहुँचाता है। मटके का या सामान्य जल पिएं।
६
भोजनोपरांत ५-१० मिनट वज्रासन
वज्रासन एकमात्र ऐसा आसन है जिसे भोजन के तुरंत बाद किया जा सकता है; यह पाचन गति को दोगुना कर देता है।
७
सप्ताह में एक दिन उपवास / फलाहार
पाचन तंत्र को विश्राम देने और शरीर के प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन हेतु उपवास सर्वोत्तम औषधि है।
८
भूख से कम खाएं, कभी ठूंस-ठूंस कर न खाएं
जब दो ग्रास की भूख शेष हो, तभी भोजन समाप्त कर दें। इससे सुस्ती नहीं आती और शरीर हल्का रहता है।
Balanced Yogic Diet

क्या आप किसी रोग से पीड़ित हैं?

मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, यूरिक एसिड, सर्वाइकल अथवा गैस-कब्ज हेतु विशेष रोगानुसार आहार तालिका देखें।

रोगानुसार आहार तालिका देखें

आंतरिक शुद्धि क्रियाएं (षट्कर्म)

आहार के साथ-साथ जल नेति, सूत्र नेति व कुंजल क्रिया द्वारा शरीर की प्राकृतिक आंतरिक सफाई करें।

शुद्धि क्रियाएं सीखें
आहार परामर्श एवं निःशुल्क मार्गदर्शन

प्रातःकाल अपने निकटतम योग केंद्र में पधारें

भारतीय योग संस्थान के अनुभवी योग शिक्षकों से अपनी प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के अनुकूल व्यक्तिगत आहार परामर्श एवं दैनिक योग साधना का निःशुल्क लाभ लें।